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मोदी जी की सरकार में सरकारी कंपनियां बंद होने की कगार पर, कुप्रबंध या निजी कंपनियों को फायदा पहुँचाने की मंशा

सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016-17 में ही सार्वजनिक उपक्रमों को 30 हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा का घाटा

निजी कंपनियों के लिए तो केंद्र सरकार का दिल बहुत बड़ा नज़र आता है, मगर जब बात सरकारी कंपनियों की आती है तो जाने क्यों मामला गड़बड़ा जाता है। पिछले दिनों संसद के मानसून सत्र में देश की सबसे बड़ी ऑडिट एजेंसी ‘सीएजी’ की पेश हुई एक रिपोर्ट बताती है की किस तरह खराब प्रबंधन की वजह से कई सार्वजनिक उपक्रम बंदी की कगार पर पहुंच रहे हैं। रिपोर्ट की मानें तो देश की सरकारी कंपनियों के घाटे का आंकड़ा एक लाख करोड़ रुपए के रिकॉर्ड ऊँचाई को भी पार कर गया है।

साल 2014 से 2017 के बीच इन उपक्रमों की हालत बद से बदतर होती गई है। छः सरकारी कंपनियों को एक हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा का नुकसान हुआ है जिनमें ‘स्टील इंडिया’ का नाम सबसे ऊपर है।

एनडीटीवी की एक रिपोर्ट के मुताबिक सीएजी की यह छानबीन कंपनी एक्ट 2013 के तहत कंपनियों के कार्यअधिकार और उनकी सेवा की हालत पर की गई है। सेबी के नियमों के तहत कंपनियां चल रही हैं या नहींइसकी भी जांच की गई है।

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