आरोपी और शिकायतकर्ता एक दूसरे से अनजान, लेकिन दो राज्यों की पुलिस के गठजोड़ ने जोड़ दिया कनेक्शन
राजस्थान के एक पत्रकार के खिलाफ शिकायत दर्ज़ लेकिन शिकयतकर्ता ने कहा, “मैंने कभी कोई मामला ही दर्ज़ नहीं करवाया, मैं कभी बाड़मेर गया ही नहीं।”
राजस्थान के एक पत्रकार के खिलाफ शिकायत दर्ज़ लेकिन शिकयतकर्ता ने कहा, “मैंने कभी कोई मामला ही दर्ज़ नहीं करवाया, मैं कभी बाड़मेर गया ही नहीं।”
राजस्थान में रहने वाला एक पत्रकार जो कभी बिहार नहीं गया, लेकिन बिहार की राजधानी पटना में एससी-एसटी एक्ट के तहत उसके खिलाफ मुक़दमा दर्ज़ हो जाता है। यही नहीं, इससे भी बढ़कर चौंकाने वाली बात यह है कि शिकायतकर्ता को भी इस बात की जानकारी नहीं है कि उसने किसी के खिलाफ एससी-एसटी कोर्ट में मुक़दमा भी दर्ज़ किया है।
बीते दिनों का यह मामला बिहार और राजस्थान पुलिस के निराला खेल की वजह से सुर्खियों में है। गौरतलब है कि 31 मई, 2018 को पटना के विशेष एससी-एसटी कोर्ट में राजस्थान के दुर्गेश सिंह पर एससी-एक्ट के तहत एक शिकायत दर्ज़ की गई। दस्तावेजों के मुताबिक, 2 जून, 2018 को शिकायतकर्ता ने अदालत में अपना बयान दर्ज़ कराया था। अदालत 16 अगस्त, 2018 को आरोपी दुर्गेश के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी की गयी। वारंट किसी प्रकार बाड़मेर के एसपी मनीष अग्रवाल तक पहुंचा और राजस्थान पुलिस इसी आधार पर राजस्थान के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को बाड़मेर से गिरफ्तार कर बिहार भेज देती है।
न्यज़लॉन्ड्री के रिपोर्ट के अनुसार दस्तावेज़ों में दर्ज़ नाम के अनुसार आरोपी का नाम दुर्गेश सिंह है, जबकि बाड़मेर की राजस्थान पुलिस दुर्ग सिंह राजपुरोहित नामक एक पत्रकार को गिरफ्तार करके उसे बिहार भेज देती है। दूसरी बात इस मामले में है कि बिहार से कोई पुलिस राजस्थान नहीं गई थी, बल्कि बाड़मेर पुलिस ने खुल इस मामले में सक्रियता दिखाई और पत्रकार को गिरफ्तार कर पटना ले गई।
न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार जब इस बाबत आरएसपी मनीष अग्रवाल से सवाल किया गया तो उन्होंने इसे राजस्थान पुलिस का कर्तव्य बताया। राजपुरोहित के सदस्यों द्वारा लगाए गए आरोप (एसपी को वारंट व्हाट्सएप के ज़रिए मिला) के सवाल पर एसपी ने कहा कि उन्हें याद नहीं कि गिरफ्तारी का वारंट किस माध्यम से उनके पास पहुंचा था।
दरअसल, इस मामले में नया मोड़ तब आता है कि जब 21 अगस्त को भास्कर ने अपने रिपोर्ट में इस मामले को लेकर एक बड़ा खुलासा किया। गौरतलब है कि रिपोर्ट के अनुसार शिकायतकर्ता राकेश पासवान से इस संबंध में जब सवाल किया गया तो उसने कहा, ” मैंने कभी कोई मामला ही दर्ज़ नहीं करवाया, मैं कभी बाड़मेर गया ही नहीं।”
दरअसल, दस्तावेज़ में शिकायतकर्ता का बयान दर्ज हैं कि उसने छह महीने बाड़मेर में आरोपी राजपुरोहित के यहां काम किया था। राजपुरोहित ने उसके वेतन के 72,000रुपए नहीं दिए।
आगे पसवान के हवाले से बयान दर्ज़ है कि पिता के ख़राब स्वास्थ्य के कारण जब वो बिहार लौट आए तो आरोपी तीन बार पटना आया। उन्हें काम पर लौटने की धमकी दी के साथ जातिवादी गालियां दी गयी और उनके साथ मारपीट भी की गयी।
यही नहीं शिकायत के मुताबिक 7 मई को आरोपी चार लोगों के साथ पटना पहुंचा और राकेश पासवान से मारपीट कर भाग गया। बयान के अनुसार आरोपी को व्यवसायी बताया गया है।
न्यूज़लॉन्ड्री के अनुसार जब 7 मई को राजपुरोहित का फेसबुक प्रोफाइल खंगाला गया तो वो उस दिन राजस्थान में ही मौजूद दिखे। वो 7 मई को बाड़मेर के ओपन माइक इंवेट में भाग ले रहे थे।
राजपुरोहित बाड़मेर में एक पत्रकार हैं जो इंडिया न्यूज़-राजस्थान से जुड़े हुए हैं। परिवार के अनुसार उनका कोई व्यवसाय नहीं है। वो शुद्ध रूप से पत्रकार ही है। उनके पिता सरकारी नौकरी में है।
अभियुक्त के बयान और उससे बढ़कर शिकायतकर्ता का बयान, इस मुक़दमे का सच बयां करने के लिए काफ़ी है। इस मामले में कई चीज़े ऐसी हैं जो मनगढ़ंत साबित हो रही हैं।
नए घटनाक्रम में न्यूज़ 18 के अनुसार शिकायतकर्ता राकेश पासवान अपने गांव से लापता है। राकेश पासवान नालंदा के अस्थवां थाने के टेटुआ गांव का रहने वाला है। उसके पिता दशरथ पासवान ने कहा कि जब से यह मामला प्रकाश में आया है, उसका बेटा गांव छोड़ कर कहीं चला गया है। उन्होंने दावा किया कि राकेश न कभी राजस्थान गया था और न ही उसने किसी व्यक्ति के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज़ कराया है। इस बीच पटना की एक अदालत शुक्रवार को दुर्ग सिंह की ज़मानत याचिका पर सुनवाई करने वाली है। इस मामले में दोनों राज्यों के पुलिस प्रशासन स्पष्ट जवाब देने से बच रही है।