मोदी के जुमलों का सच, ग्रामीण परिवारों के कुल औसत आय में खेतीबाड़ी की हिस्सेदारी घटी
2012-13 में कृषक परिवारों के कुल औसतन आय में खेतीबाड़ी की हिस्सेदारी 67.2 फीसदी थी जो अब नाबार्ड के आंकड़े के अनुसार घटकर 43 फीसदी पर आ गई।
मोदी सरकार 2021 तक किसानों की आमदनी दुगनी करने का दावा ज़रूर कर रही है लेकिन नाबार्ड के नए सर्वेक्षण में कृषि आय की हिस्सेदारी घटती दिख रही है। सर्वेक्षण में सामने आया है कि ग्रामीण परिवारों में कुल आय में कृषि से आय की हिस्सेदारी महज़ 23 फीसदी ही है। वहीं कृषक परिवार को लेकर आंकड़ा देखें तो यह हिस्सेदारी भी मात्र 43 फीसदी ही नज़र आ रहा है जो खेती-किसानी के साथ पशुपालन से अर्जित किया जा रहा है।
हिंद किसान की एक रिपोर्ट के अनुसार नाबार्ड के सर्वे के अनुसार साल 2016-17 में भारत में कुल 21.7 करोड़ ग्रामीण परिवार थे। इसमें मात्र 48 फीसदी ही कृषक परिवार हैं जो खेती-किसानी और पशुपालन पर निर्भर हैं। बाकी 52 फीसदी गैर-कृषक परिवार हैं जो खेतीबाड़ी नहीं करते। नाबार्ड का यह सर्वे 2015-16 के मासिक आय पर आधारित है। इसके अनुसार ग्रामीण परिवारों की औसत मासिक आय 8059 रुपया हैं जिसमें मज़दूरी आय का प्रमुख स्त्रोत है। जहां खेतीबाड़ी से कुल 1439 रुपए प्राप्त हुए तो वहीं मज़दूरी से औसतन 3504 रुपए की आमदनी हुई। सरकारी और निजी नौकरी की हिस्सेदारी भी खेतीबाड़ी से आगे है। इसके ज़रिए 1906 रुपए की आमदनी हो रही है।
कृषक परिवार पर नज़र डालें तो कुल आय 8931 रुपए में से जहां खेती से 3140 रुपए, पशुपालन से 711 रुपए तो मज़दूरी से 3025 रुपए प्राप्त हो रहे हैं। यहां भी मजदूरी और नौकरी प्रमुख साधन दिख रहा है। फीसदी के हिसाब से देखें तो महज़ 43 फीसदी ही आय खेती और पशुपालन से आता है। बाकी 57 फीसदी आय के अलग-अलग स्त्रोत हैं।
साल 2012-13 में जब नेशनल सैम्पल सर्वे ऑफिस ने जब कृषक परिवार के आमदनी को लेकर सर्वे किया था तो कुल औसतन आय में खेतीबाड़ी का हिस्सा 67.2 फीसदी था जो अब नाबार्ड के आंकड़े में घटकर 43 फीसदी पर आ गया है।
सर्वे के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन यह एक सच्चाई है कि धीरे-धीरे ग्रामीण परिवारों की आय में भी खेती- किसानी की हिस्सेदारी घट रही है। खेतीबाड़ी में हो रहे नुकसान की वजह से किसान खेतीहर मज़दूर में बदल रहे हैं या शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।